This is a guest post by my father, Mr. Anuranjan Patanaik - AGM Central Establishment Section, Reserve Bank of India. The views expressed here are his own and  and do not reflect the views of RBI.
जिंदगि में कोई दर्द नहीं उठाना चाहता है | लेकिन दर्द किसीका भी पीच्छा छोडता नहीं है | हमारी भलाई इसमें है कि हम उसका अर्थ समझे | हमें यह समझ लेना चाहिए कि हर समय दर्द का कोई ना कोई कारण होता है | वह कारण  हम से ही बनता है | लिकिन हम उस का स्रोत के लीए इधर उधर तलासते रहते है | हम अनजाने से दर्द का आधर बनाते रहते है | लेकिन जब दर्द आजाता है तो हम दूसरों को कोसते रह जाते हैं |   हर समय यह समझना कि दर्द से हमारा नुकसान ही होता है, सही नहीं है | सच में दर्द आता है जब हम गलत रास्ते में होते हैं और सही रास्ते पर आना बहूत ही जरूरत होता है | कभी कभी दर्द के चपेट में आकर इंसान मौत चाहता है, मर भी जाता है ; जब कि उस दर्द में ही उसका आगे के जीवन का आधार होता है | जिंदेगि का विकास का आधार होता है दर्द का अर्थ समझ्ने के लिए हमारी कुशलता | आज कल बच्चे बुढे मा-बापों का खयाल नहीं रखते | उन्हें क्या पत्ता कि बच्चों को उन्होंने ही एसे बनाया है | सालों पहले मैं अपनी श्रीमती के साथ अपने तीन साल के छोटे बेटे को लेकर स्कूल  प्रींसपाल से मिलने गया उसे किंडर गार्टन क्लास में भर्त्ति कराने के लिए | प्रिंसपाल साहेबा के कार्यालय में दो अतिथि के लिए ही बैठेने की इंत्जाम थी और हम पति पत्नि बैठ गये | लेकिन बेटा अपने ममी को उठाकर वह आसन में बैठ गया | उस पर प्रींसपाल साहेबाने हमें आधे घण्टे का भाषण दिया जिस का अर्थ था कि बच्चों को कष्ठ में हिस्सा लेने की शीख बच्च्पन से ही प्राप्त होना चाहिए | जब मा बच्चा बिमार होने पर रात भर जाग़कर उसका देख भाल करती है तो जब खुद बिमार होती तो बच्चा से भी कुच्छ अपनी सेवा करवाए |एक दिन एक सेवानिवृत्त प्रशासनीक अधिकारी के घर में गया था | बातो बातों में उन्हों ने बताया कि उनका पोता आगे चलकर एक अच्छा इनसान नहीं बनेगा | उनका एसे कहने का यही कारण था कि पीसाव करने के बाद उनका पोता फ्लास नहीं करता है और इस संबंध में कही गई दादाजी की बात को टाल देता है |  जब वे यह बात अपने बहू-बेटे के पास लेते तो वे भी हस देते | यानि अपने बच्चों में हम एसे कुच्छ आदतें डाल देते हैं जो आगे चल कर हमारा दर्द का कारण बनजाता है | ऐसे कुच्छ मा-बाप होते हैं जो बच्चों के लिए एक छाया देनेवाला बडा पेड हो जाते हैं जिनके नीचे रहकर बच्चे कुच्छ काम के लायक नहीं रहते| वही नालायक बच्चे आगे चलकर हमारे दर्द का कारण बनते हैं | कुच्छ मा बाप बच्चों से एसे अंधा प्यार करते हैं कि उनकी कुच्छ भी बुराइ उन्हें दिखाइ नहीं देता | ऐसे मा बाप के बच्चे खुद दर्द उठाते हैं और दूसरों को भी दर्द देते हैं | स्वामि  विवेकानंद का यह अनुभव रहा है कि इंसान भगवान से जो मागता है उसे वह मिलता नहीं है, लेकिन उसे जो चाहीए व भगवान से जरूर मिलता है | इसका मतलव यह हुआ है कि इंसान जब कोइ बडा काम करने का ठान लेता है तो उसके सामने एक से बढ कर एक तकलीफ खडा हो जाता है जिस से उसे दर्द होने लगता है | जब पंच पाण्डव 13 साल का वनवास और एक साला के अज्ञात वास का दर्द उठा रहे थे तब वे वास्तव में आगे आनेवाले महाभारत युद्ध के लिए ताकत इकट्ठे कर रहे थे | सम्राट बनते बनते वन जाने के चक्र में पुरुषोत्तम राम को जो दर्द मिला उससे ही वे सभी के पूजा के पात्र बने | रावण निहत होने के बाद जब दशरथ स्वप्न में आये और उन्हें वरदान का प्रस्त्ताव रखा तो पुत्र विच्छेद के दर्द से असमय मृत्यु वरण कर चुके दशरथ से श्री रामने कहा कि अपनी माता कौशल्या से माता कैकेई किसी भी मामले में कम नहीं है | माता कैकेई ही अपमान का दर्द सह कर श्री राम को अद्वितीय काम करने का अवसर दिया था | श्री रामने दशरथ से माता कैकेई को त्याग देने का श्राप वापस लेने का अनुरोध किया | इसलिए जब हमारे सामने दर्द का पहाड आ जाता है तब हमें यह याद रखना है कि आगे बहुत अच्छी चीज आनेवाली है | शीत के दर्द झेलने के बाद ही वसंत आता है और गर्मी के दर्द से ही वारीष आती है | जीवन के हर पल हमें निर्णय लेना पडता है | अगर निर्णय सही हुआ तो आनंद ही आनंद प्राप्त होगा नहीं तो दर्द का सामना हो जाएगा | लेकिन कोई निर्णय शुरु से सही या गलत नहीं होता| उसे समय के साथ प्रयास करके सही साबित करना पडता है |  चर्चिल जैसे महान व्यक्ति ने कहा है कि सफलता का अर्थ है कि एक नाकामि से दूसरे नाकमि में जाते जाते आत्मबल में कमी नहीं होना चाहिए | लेकिन हम  एसे है कि विफलता के दर्द में हम थम सा जाते हैं | श्रीमद भगवत गीता में अर्जुन को प्रभु श्रीकृष्ण योगस्थ हो के कर्म करने का सलाह देते हैं | योगस्थ का अर्थ समझाते हुए कहते है कि सिद्धि और असिद्धि में बराबर रहना ही योग्स्थ है | इसलिए हमें असफ्लता के दर्द को एक उपयोगी दर्द समझना चाहिए | जैसे स्वमि सुख्बोधानन्द कह्ते है, असफलता का दर्द सफलता का खाद होता है | पति-पत्नि के सम्बंध केकारणभीकभी कभीदर्दपैदा होता है | कहा जाता है कि पति-पत्निएकदूसरेके लिएदोनोंस्वर्गऔरनर्क काद्वारहोते हैं | स्वर्ग के लिए द्वार तब खुलता है जब वे एक दूसरे की भलाई जानते है और उसेबढावा देते है | इस्के साथ साथ वे एक दूसरे कीकमजोरीसमझ्ते हैं और उस का खयाल रखते हैं | नर्क के लिए द्वार तब खुल जाता है जब एक दूसरे से ऐसा अंधा प्यारकरता (करती) है कि दूसरे (दूसरी) की हरगलतसलाहकोसहीसमझ कर उस परअमलकरता रहता(करती रहती) है और उसके कारण बने दर्द के लिए नशीव कोकोशता रहता (कोशती रहती) है |  या कभी कभी पति-पत्नि में किसी एक का हुकमत एसा चलता है कि उसकी हर कमजोरीपरिवारपर लागू हो जाता है | यह भी पाया गया है कि पति-पत्नि दोनों को ही एक दूसरे के प्रति कोई लगाव नहीं होता और वे परिवार को अपनी मनमानी ढ्ग से चला कर नर्क की ओर परिवार को खींच लेते हैं | ये सब से जो दर्द होता है व यह बताता है कि अपने को सुधारो,लेकिन इंसान कोउसकासमझ ही नहीं होता | मेरे एक दोस्त ने अपनी मा-बाप की शादी के पंचासवा सालगिरा पर एक शुभेच्छा कार्ड भेजा जिस के जबाब में उनके पापाने लिखा कि आजा कल बैवाहक जीवन इतना दूर्विसह होता है कि एक साल पूरे होने पर उत्सव मनाने को मन करता है, लेकिन उनका जीवन एसा सुखमय था कि कब पचास साल हो गया पत्ता ही लगा नहीं | स्वर्ग में रहना ऐसा होता है | गलत विचार से भी दर्द पैदा होता है | कहा जाता है कि पूलिसवालों के बच्चे अच्छे नहीं होते | अगर बच्चे अच्छे हो जाते होतो परिवार में किसी को ऐसी विमारी हो जाती है जिस का इलाज नहीं होता है | अगर एसे भी नहीं हुआ तो परिवार में शांनि नहीं होता | यानि एसे परिवार दर्द ही दर्द में रहता है | एसे कहने का कारण यह है कि पुलिसवाले आम तौर पर गंधे विचारवाले लोगों के संगत में ज्यादा आते है | इससे परिवार में आनेवाला दर्द को रोका जा सकता है | यह भी पाया गया है कि उच्च पद पर रहनेवाले लोग अपनी क्षमता को दूसरों की बुराई करने में लगाते रहते है जिस के कारण वे अपने जीवन में दर्द पैदा करवाते हैं | हमारा मन जो बार बार सोचता है वही हमारे जीवन में हो जाता है | छोटे पद पर कार्य करनेवाले अपने अच्छे साहब के बारे में सोचते रहते उनकी शैली को अपने जीवन में अपनाते जिस के कारण उनके बच्चे उच्च पद पर पहुंच जाते | लेकिन बडे साहब के साथ उसका उलटा होता है | एक कहानी ऐसे है कि एक वेश्या और एक साधु रास्ते के अगले बगले रह्ते थे | वेश्या हर वक्त साधु के बारे में शोचती रहती थी और अपनी नशिब को कोशती रह्ती थी | जब कि साधु वेश्या के पास आनेवाले हर ग्राहक के लिए एक छोटा सा पथर रखते जाते थे | उनके पास छोटे पथरों का पहाड बन गया | दोनों का देहांत एक समय पर हुआ | वेश्या गई स्वर्ग में और साधु नर्क में | सुखदायक जगह पर बैठ कर इंसान दर्द पैदा कर सकता है और दुःखदायक जगह पर बैठ कर सुख में जा सकता है | हमें सचेत रहना पडेगा ताकि हमारे जीवन मेंदर्दन आए | लेकिन दर्द आने का मतलब नहीं  किसबकुच्छ खतम हो गया | उसे हमें समझ्ना है और उस के मांग के अनुयाई हमें बिहित कदम उठना है | दर्द से कष्ट नहीं होता है, कष्ट होता है दर्द को लेकर हमारे समझ से | बिना दर्द से कुच्छ नहीं मिलता और जब दर्द ही देखाई देता है उसको सही तरह से समझ कर उपयुक्त कदम लेने पर जीवन बेहतर हो सकता है | Print This Post Print This Post
Tagged with:  

Looking for something?

Use the form below to search the site:

Still not finding what you're looking for? Drop a comment on a post or contact us so we can take care of it!

Visit our friends!

A few highly recommended friends...

Archives